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Editor's Desk
Sansad Pal Wants No LokPal Print E-mail
Monday, 02 January 2012
Sansad Pal  Wants No LokPal

लोकपाल विधेयक का जैसा हश्र लोकसभा और फिर राज्यसभा में हुआ उससे यह साफ हो गया कि राजनीतिक दल यह चाह ही नहीं रहे है कि यह विधेयक कानून की शक्ल ले। जहां सत्तापक्ष राज्यसभा में अपने अल्पमत होने की स्थित से बखूबी परिचित होने के बावजूद विपक्ष की आपत्तियों को न मानने के लिए अड़ा रहा वहीं विपक्ष के साथ-साथ सहयोगी दलों ने भी ऐसी चाल चली की मौजूदा रूप में यह बिल पास ही न हो पाये। लोकपाल के मुद्दे पर दोनों पक्षों में जो विरोधाभास था उनमें

एक- लोकायुक्त संबधी प्रावधान था और

दूसरा- सीबीआई की स्वायत्ता का और

तीसरा- लोकपाल के चयन और निष्कासन के अधिकार को लेकर था।

लोकायुक्त संबधी प्रावधान- कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस को छोड़कर भाजपा सहित सभी छोटे-बड़े दल एकजुट होकर राज्यों में लोकायुक्त के गठन का विरोध कर रहे थे। ये सभी दल इसे भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे के खिलाफ बता रहे थे। उनका कहना है कि केंद्र सरकार इस कानून का गलत इस्तेमाल उन राज्यों में जहां विपक्षी दलों की सरकारें हैं के खिलाफ करेंगी। हालांकि यह तकनीकी आधार आज के राजनैतिक स्तर मे सही भी साबित हो सकता है परंतु ऐसे बहुत से कानुन है, जिसका इस्तेमाल केंद्र सरकारें राज्यों के खिलाफ करती रहीं है। संघीय ढ़ांचे और राज्य के अधिकारो की दुहाई देकर भ्रष्टाचार विरोधी इस बिल को रोकना कतई उचित नहीं है क्योंकि भ्रष्टाचार का दानव एक सरर्वयापी रूप मे हैं। क्या उसकी प्रकृति केंद्र और राज्यों में बदल जाती है? नहीं। तो  फिर उससे लड़ने वाले कानुन अलग-अलग प्रकृति के क्यों हों। कानून की एकरूपता उसके पालन में सुद्ढ़ता और शक्ति देता है। अन्यथा कार्यपालिका हमेशा ही कानुनी पचड़ो में पडी रह जाती है और दोषी कानून को मुँह चिढाता रहता है।

 
Anna Movement Needs Direction Print E-mail
Sunday, 01 January 2012
Anna Movement Needs Direction
इस साल के आखिरी सप्ताह ने पूरे साल के भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष पर पानी फेर दिया है। इसी सप्ताह साल भर का यह संघर्ष जबरदस्त जोश के साथ चरम पर पहुँच गया और वहीं जाकर चकनाचूर भी हो गयाय़ इस त्रासदी का एक हिस्सा मुंबई के MMRDA मैदान और दूसरा हिस्सा हमारी संसद के दोनों सदनों में दिखाई दिया। दोनों जगहों से सुखद संभावनाओं के साथ देशवासी नए साल का इंतजार कर रहे थे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी जवभावना के लिहाज से ये असफलतायें अस्थायी सिद्ध हों। इन कड़वे अनुभवों से सबक लेकर सभी जनतांत्रिक शक्तियां आगे सावधानी से काम करें तो नए साल में भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम शायद किसी मुकाम तक पहुंच सके। यह भी सही है कि लोकपाल के मामले पर बहुत जल्दबाजी में और बहुत ज्यादा पाने की आशा की गई थी, जो कि शायद उचित भी नहीं था। इस सोच के हिसाब से साल भर के संघर्ष पर अब एक अवसर आत्ममंथन का आया है। दोषारोपण की जगह पर समझदारी, समायोजन और संयम से काम लिया जाना चाहिए। इस साल के वृतांत का मुख्य कथानक भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष ही रहा, जिसकी बुनियाद 2010 के अंत में राष्ट्रमंडल खेलों के बाद ही रख दी गई थी।g
 
Midnight Autocracy Print E-mail
Saturday, 31 December 2011
Midnight Autocracy

आधी रात का सच

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 14-15 अगस्त 1947, की मध्यरात्रि में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने मशहूर भाषण में कहा था बहुत समय पहले हमने अपने नियति के साथ एक वादा किया था और अब वह समय आ गया है जब हमें यह शपथ फिर से दुहरानी चाहिए कि राष्ट्र और उनके लोगों की सेवा की अपनी प्रतिबद्धिता में हम कभी पीछे नहीं हटेंगे। उनके शब्द इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गए। फिर 64 सालों बाद 29-30 दिसंबर, 2011 की मध्यरात्रि मे संप्रग सरकार ने संसद के पटल पर जो कुछ किया वह भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया पर काले शब्दों में। यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहते तो सदन में खड़े होकर कह सकते थे कि मैंने देश की जनता से जो वायदे किये थे उन्हें पूरा किया। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सत्ता की राजनीति में बहुत कुछ ऐसा देखना पड़ता है जो बहुत ही भद्दा होता है, लेकिन गत रात्रि जो कुछ हुआ उसे देखते हुए मुझे संसद का एक विद्यार्थी और संसदीय लोकतंत्र का इतिहासकार होने के नाते यह कहना पड़ेगा कि यह हमारे लोकतंत्र पर लगा एक बदनुमा धब्बा है। आने वाली पीढियां इसके लिए हमें शायद कभी क्षमा न करे। इसी तरह के आचरण देश में समस्याँए पैदा करती हैं। अगर लोगों को लगने लगे कि जनता के प्रतिनिधियों की जो सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था है वह कुछ भी नही कर पा रही हैं या उसमें सत्ता की राजनीति इतनी हावी हो जाती है कि जनहित और राष्ट्रहित, संसदीय परंपराएं और संवैधानिक मूल्यों की तिलांजलि दे दी जाती है तो जनता की आस्था संविधान में और संसदीय व्यवयस्था से डगमगाने लगती हैं।

       कल रात राज्यसभा में सरकार की तरफ से दिया गया यह बयान कि सत्र खत्म करने के सिवा और कोई दूसरा विकल्प नही है, एक गलतबयानी थी। कम से कम सदन में एक संशोधन यानी राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति और उसके संबंध में कानून बनाने की विधानमंडलों की शक्ति को लेकर बहुमत साफ था। इसके पक्ष में भाजपा समेत बसपा, बीजद, तृणमूल कांग्रेस आदि एकमत थे यानि इस एकमात्र संशोधन की स्वीकार्यता पर लोकपाल विधेयक पारित हो जाता , लेकिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं हुई। जब सदन का बहुमत विधेयक को पारित करने के पक्ष में था तो इसका कोई औचित्य नहीं कि बहुमत का सम्मान न किया जाता। यदि सरकार सचमुच गंभीर होती तो यह विधेयक पारित हो जाता। यदि सरकार इस मसले को भी टालना चाहती थी, तो मामला राज्यसभा की प्रवर समिति को भेजा जा सकता था और विधेयक को पारित करा लिया जाता और बाकी संशोधन बाद में ही हो जाते, लेकिन ऐसा करने के बजाय सदन को मतदान न करने देने का रास्ता अपनाया गया। वास्तव में एक सोची-समझी पलायन की रणनीति बनाई गई और सदन में मतदान से बचा गया। दरअसल, राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ा मुद्दा लोकपाल के बजाय आगामी पाँच राज्यों के चुनाव है, जिसके मद्देनजर ही दोषारोपण का खेल आरंभ हुआ। कुछ न कुछ दोष तो सबका है, लेकिन सरकार सर्वाधिक दोषी है।

       लोकपाल को संसद में रखवाने के लिए सरकार को विवश करने जैसे दुर्गम कार्य करने का श्रेय निशचित् ही टीम अण्णा को जाता है, लेकिन कई संदर्भों में उनकी भूमिका काफी अड़ियल रही क्योंकि वे अपने ड्राफ्ट को अक्षरसः मनवाने के लिए काफी अधिक दबाव बनाती दिखी। मेरा मानना है कि विधि की यात्रा कभी खत्म नहीं होती। विधिनिर्माण एक निरंतर और सतत् क्रियाशील प्रक्रिया है, जिसमें पडाव तो आते हैं लेकिन अंत कभी नहीं आता। यही कारण है कि भारत जैसे गणतांत्रिक राष्ट्र जिसकी संवैधानिक पृष्ठभूमि सबसे बडी है, को भी अपने कानून में लगातार संशोधनों के जरिये समयानुसार बनाये रखा गया है। 100 से अधिक संशोधनों से गुजरते हुए हमारा संविधान काफी सशक्त और परिपक्व हो चुका है। फिर भी समयानुसार परिवर्तन होते रहने चाहिए। इस प्रकार लोकपाल के ड्राफ्ट चाहे टीम अण्णा के हो, मेघा पाटेकर के हों या फिर सरकारी हो यह निशिचत् ही है कि आनेवाले समय में उसमें संशोधन करनी होगी। कालांतर में यह बार बार साबित हो चुका है और टीम अण्णा के सदस्य भी इससे सीधे तौर पर इंकार नहीं कर सकती है। बर्ष 2011 के आखिरी शुक्रवार की रात्रि, IBN7 चैनल पर आशुतोष के साथ बात करते हुए टीम अण्णा के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल ने भी इस बात को माना और कहा कि यदि सरकार की मंशा साफ होती तो कम से कम एक कदम तो चला ही जा सकता था जब बहुमत विपक्ष एक साथ था। ऐसे में सरकार ने मतदान प्रक्रिया को रोक कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह ऐसा कोई कानून लाना ही नही चाहती जिससे उसकी तानाशाही कम हो।

अब सवाल संसद में लोकपाल विधेयक के पास होने या नहीं होनेभर से नहीं रह गया है। अब भारत के युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों से यह प्रश्न है कि वे इस प्रकार की अहंकारी सरकार को और कितने दिनों तक बर्दाशत करेंगे? आगामी पाँच राज्यों के चुनाव में जनता को अपना रुख स्पष्ट करना ही होगा अन्यथा वर्तमान व्यवस्था में सिर्फ टीम अण्णा के विरोध करने से भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिलने वाली है।

 
Govt. Need To Distinguish Aadivasi And Maoist Print E-mail
Friday, 23 December 2011
    झारखंड हाईकोर्ट ने अंततः जीतन मरांड़ी को निर्दोष साबित कर ही दिया। जिस शख्स को गिरीडीह की निचली अदालत ने अपर्याप्त सबूत के आधार पर फांसी की सजा सुनाई थी, उसे बाइज्जत रिहाई मिल गई। पिछले साढे तीन सालों से जेल में बंद जीतन की रिहाई की माँग ने देश की जनवादी शक्तियों को एक मंच पर ला कर खड़ा कर दिया था। झारखंड के आदिवासियों की आवाज बनने वाले गरीबी में पले-बढ़े जीतन मरांडी की कहानी छत्तीसगढ़ के विनायक सेन से अलग नहीं है।
    संसकृतिकर्मी जीतन गिरिडीह के पीरटाँड़ थाना स्थित करन्दों गांव का रहनेवाला है। उसने आदिवासियों की पीड़ा और ऑन्दोलन को अपने गीतों में कलमबद्ध किया है। १५ अप्रैल २००८ मे पुलिस ने उसे माओवादी बताते हुए चिलखारी नरसंहार में शामिल होने के आरोप में जीतन को गिरफ्तार कर लिया। २६ अक्तूबर २००७ को माओवादियों ने बहुचर्चित चिलखारी नरसंहार कांड अंजाम दिया था जिसमें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के पूत्र सहित १९ जानें गईं थी। लेकिन जिस दिन यह नरसंहार हुआ, उस दिन जीतन वहाँ मौजूद नहीं था जबकि पुलिस ने ऐसे गवाहों के आधार पर उसे आरोपी बना दिय़ा जो घटना के समय वहां मौजूद नहीं थे। इस फैसले ने एक भार फिर झारखंड पुलिस की विशवसनीयता पर सवाल खड़े कर दिये हैं।
    गिरफ्तारी से पहले जीतन गरीबों की जिंदगी पर वीडियो फिल्म बना रहा था जिसमें पुलिसिया दमन और अत्याचार का वर्णन है लेकिन जेल जाने के कारण फिल्म अधूरी रह गई। बहरहाल, लोकतांत्रिक ताकतों ने लड़ाई जारी रखते हुए भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ एकजुटता का परिचय दिया और जता दिया कि लोकतंत्र में तानाशाही की कोई जगह नहीं है। जीतन के आलावा मनोज रजवार, अनिल राम व छत्रपति मुंडा को भी पुलिस ने नरसंहार का दोषी बना दिया था पर उनकी भी बेगुनाही साबित हुई। जीतन की पत्नी अपर्णा मरांड़ी ने अपने पति की रिहाई के लिए संघर्ष जारी रखने का जो संकल्प लिया था उसमें उसे जीत मिली। लड़ाई में शुरू में अपर्णा न केवल अकेली थी बल्कि गर्भवती भी थी लेकिन धीरे-धीरे प्रगतिशील और आंदोलनकारी तबका इससे जुड़ने लगा। न केवल झारखंड बल्कि दिल्ली, आंध्रप्रदेश, पशिचम बंगाल, उतराखंड, छतीसगढ़ आदि से भी जीतन की रिहाई की आवाज बुलंद होने लगी। पिछले दिनों इसी मांग को लेकर रांची में सैकड़ों लोग जुटे जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता डा. विनायक सेन, जनकवि वरवर राव, पत्रकार प्रशांत राही सरीखी वे शख्सियतें मौजूद रहीं जो खुद इस दौर से गुजरी हैं। हाल ही में दिल्ली मे जीतन की रिहाई की मांग करत हुए विभिन्न जनसंगठनों के कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्दिजीवियों, सांस्कृतिककर्मियों का जमावड़ा हुआ था।
    जीतन मरांडी के गीत यहां हर उस आदमी की जुबां पर है जिसका सरोकार आदिवासियों के हक में लड़ी जानेवाली लड़ाइयों से है। जब जीतन जेल में थे तब भी उनकी कलम गीत रच रही थी। झारखंड जैसे राज्य जहां २४ में से २१ जिले घोर नक्सल प्रभावित हैं, जहां माओवादी खोज अभियान जोरों पर है वहां किसी को भी माओवादी बता कर उसको जेल में ठूंस देना हैरानी की बात नहीं। ज्यादा दिन नहीं हुए जब नक्सल प्रभावित लातेहार मे पुलिस ने ग्रीनहंट के ऑपरेशन प्रहार के दौरान आदिम जनजाति के वफा परहीया की आंख फोड़ दी  और बिरजू के हाथों की उंगलियां काट दीं थी। अति पिछड़े छेत्र सारंडा में पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मंगल होनहांगा और सोमा गुड़िया को जान गंवानी पडी।
 
IAS Goswami : A Long Journey In Shortest Time Print E-mail
Wednesday, 07 January 2009
IAS Goswami : A Long Journey In Shortest Time
Gautam Goswami who born in bihar in 1966 was an Indian civil servant, who faced allegations of corruption. He was also a MBBS doctor and a gold medalist. Have a very sharp mind since his early childhood he took part in the toughest Civil services exam and compete it in very first attempt. This is especially significant that he did not have any bureaucratic family background.
Goswami was eulogized as a young hero for his supervision of relief efforts after floods hit Bihar in 2004. It was RJD ruling in Bihar under the leadership of Laloo yadav with the masque of his wife Rabri Devi as Chief mininster. It was a time of hightest law lessness in Bihar. In later years is now alleged, however, that throughout, Goswami allegedly channelled government money set aside for flood relief into a labyrinth of private accounts. The Indian Express first started reporting on possible misappropriations in 2004. These investigative reports soon caused a backlash against the officer.
The reports meticulously detailed the suspected modus operandi. Goswami, it was said, was funnelling funds to a private company named Baba Satya Sai Industrial Corporation, and maintaining in the records books that money was paid to BSSIC. BSSIC, incidentally was also the acronym of the state agency, Bihar Small Scale Industries Corporation, that oversaw relief work. It is reported that one year later, during the audits, it was discovered that less than 1% of the money reached those affected. Goswami was eventually re-instated. His health had been an area of concern and he was being treated for pancreatic cancer.
 
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