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Midnight Autocracy

Patna
Midnight Autocracy
December 31, 2011

आधी रात का सच भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 14-15 अगस्त 1947, की मध्यरात्रि में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने मशहूर भाषण में कहा था – बहुत समय पहले हमने अपने नियति के साथ एक वादा किया था और अब वह समय आ गया है जब हमें यह शपथ फिर से दुहरानी चाहिए कि राष्ट्र और उनके लोगों की सेवा की अपनी प्रतिबद्धिता में हम कभी पीछे नहीं हटेंगे। उनके शब्द इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गए। फिर 64 सालों बाद 29-30 दिसंबर, 2011 की मध्यरात्रि मे संप्रग सरकार ने संसद के पटल पर जो कुछ किया वह भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया पर काले शब्दों में। यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहते तो सदन में खड़े होकर कह सकते थे कि मैंने देश की जनता से जो वायदे किये थे उन्हें पूरा किया। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सत्ता की राजनीति में बहुत कुछ ऐसा देखना पड़ता है जो बहुत ही भद्दा होता है, लेकिन गत रात्रि जो कुछ हुआ उसे देखते हुए मुझे संसद का एक विद्यार्थी और संसदीय लोकतंत्र का इतिहासकार होने के नाते यह कहना पड़ेगा कि यह हमारे लोकतंत्र पर लगा एक बदनुमा धब्बा है। आने वाली पीढियां इसके लिए हमें शायद कभी क्षमा न करे। इसी तरह के आचरण देश में समस्याँए पैदा करती हैं। अगर लोगों को लगने लगे कि जनता के प्रतिनिधियों की जो सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था है वह कुछ भी नही कर पा रही हैं या उसमें सत्ता की राजनीति इतनी हावी हो जाती है कि जनहित और राष्ट्रहित, संसदीय परंपराएं और संवैधानिक मूल्यों की तिलांजलि दे दी जाती है तो जनता की आस्था संविधान में और संसदीय व्यवयस्था से डगमगाने लगती हैं।        कल रात राज्यसभा में सरकार की तरफ से दिया गया यह बयान कि सत्र खत्म करने के सिवा और कोई दूसरा विकल्प नही है, एक गलतबयानी थी। कम से कम सदन में एक संशोधन यानी राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति और उसके संबंध में कानून बनाने की विधानमंडलों की शक्ति को लेकर बहुमत साफ था। इसके पक्ष में भाजपा समेत बसपा, बीजद, तृणमूल कांग्रेस आदि एकमत थे यानि इस एकमात्र संशोधन की स्वीकार्यता पर लोकपाल विधेयक पारित हो जाता , लेकिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं हुई। जब सदन का बहुमत विधेयक को पारित करने के पक्ष में था तो इसका कोई औचित्य नहीं कि बहुमत का सम्मान न किया जाता। यदि सरकार सचमुच गंभीर होती तो यह विधेयक पारित हो जाता। यदि सरकार इस मसले को भी टालना चाहती थी, तो मामला राज्यसभा की प्रवर समिति को भेजा जा सकता था और विधेयक को पारित करा लिया जाता और बाकी संशोधन बाद में ही हो जाते, लेकिन ऐसा करने के बजाय सदन को मतदान न करने देने का रास्ता अपनाया गया। वास्तव में एक सोची-समझी पलायन की रणनीति बनाई गई और सदन में मतदान से बचा गया। दरअसल, राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ा मुद्दा – लोकपाल के बजाय आगामी पाँच राज्यों के चुनाव है, जिसके मद्देनजर ही दोषारोपण का खेल आरंभ हुआ। कुछ न कुछ दोष तो सबका है, लेकिन सरकार सर्वाधिक दोषी है।        लोकपाल को संसद में रखवाने के लिए सरकार को विवश करने जैसे दुर्गम कार्य करने का श्रेय निशचित् ही टीम अण्णा को जाता है, लेकिन कई संदर्भों में उनकी भूमिका काफी अड़ियल रही क्योंकि वे अपने ड्राफ्ट को अक्षरसः मनवाने के लिए काफी अधिक दबाव बनाती दिखी। मेरा मानना है कि विधि की यात्रा कभी खत्म नहीं होती। विधिनिर्माण एक निरंतर और सतत् क्रियाशील प्रक्रिया है, जिसमें पडाव तो आते हैं लेकिन अंत कभी नहीं आता। यही कारण है कि भारत जैसे गणतांत्रिक राष्ट्र जिसकी संवैधानिक पृष्ठभूमि सबसे बडी है, को भी अपने कानून में लगातार संशोधनों के जरिये समयानुसार बनाये रखा गया है। 100 से अधिक संशोधनों से गुजरते हुए हमारा संविधान काफी सशक्त और परिपक्व हो चुका है। फिर भी समयानुसार परिवर्तन होते रहने चाहिए। इस प्रकार लोकपाल के ड्राफ्ट चाहे टीम अण्णा के हो, मेघा पाटेकर के हों या फिर सरकारी हो – यह निशिचत् ही है कि आनेवाले समय में उसमें संशोधन करनी होगी। कालांतर में यह बार बार साबित हो चुका है और टीम अण्णा के सदस्य भी इससे सीधे तौर पर इंकार नहीं कर सकती है। बर्ष 2011 के आखिरी शुक्रवार की रात्रि, IBN7 चैनल पर आशुतोष के साथ बात करते हुए टीम अण्णा के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल ने भी इस बात को माना और कहा कि यदि सरकार की मंशा साफ होती तो कम से कम एक कदम तो चला ही जा सकता था जब बहुमत विपक्ष एक साथ था। ऐसे में सरकार ने मतदान प्रक्रिया को रोक कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह ऐसा कोई कानून लाना ही नही चाहती जिससे उसकी तानाशाही कम हो। अब सवाल संसद में लोकपाल विधेयक के पास होने या नहीं होनेभर से नहीं रह गया है। अब भारत के युवाओं और प्रबुद्ध नागरिकों से यह प्रश्न है कि वे इस प्रकार की अहंकारी सरकार को और कितने दिनों तक बर्दाशत करेंगे? आगामी पाँच राज्यों के चुनाव में जनता को अपना रुख स्पष्ट करना ही होगा अन्यथा वर्तमान व्यवस्था में सिर्फ टीम अण्णा के विरोध करने से भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिलने वाली है।