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Govt. Need To Distinguish Aadivasi And Maoist

Patna
Govt. Need To Distinguish Aadivasi And Maoist
December 23, 2011

    झारखंड हाईकोर्ट ने अंततः जीतन मरांड़ी को निर्दोष साबित कर ही दिया। जिस शख्स को गिरीडीह की निचली अदालत ने अपर्याप्त सबूत के आधार पर फांसी की सजा सुनाई थी, उसे बाइज्जत रिहाई मिल गई। पिछले साढे तीन सालों से जेल में बंद जीतन की रिहाई की माँग ने देश की जनवादी शक्तियों को एक मंच पर ला कर खड़ा कर दिया था। झारखंड के आदिवासियों की आवाज बनने वाले गरीबी में पले-बढ़े जीतन मरांडी की कहानी छत्तीसगढ़ के विनायक सेन से अलग नहीं है।    संसकृतिकर्मी जीतन गिरिडीह के पीरटाँड़ थाना स्थित करन्दों गांव का रहनेवाला है। उसने आदिवासियों की पीड़ा और ऑन्दोलन को अपने गीतों में कलमबद्ध किया है। १५ अप्रैल २००८ मे पुलिस ने उसे माओवादी बताते हुए चिलखारी नरसंहार में शामिल होने के आरोप में जीतन को गिरफ्तार कर लिया। २६ अक्तूबर २००७ को माओवादियों ने बहुचर्चित चिलखारी नरसंहार कांड अंजाम दिया था जिसमें राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के पूत्र सहित १९ जानें गईं थी। लेकिन जिस दिन यह नरसंहार हुआ, उस दिन जीतन वहाँ मौजूद नहीं था जबकि पुलिस ने ऐसे गवाहों के आधार पर उसे आरोपी बना दिय़ा जो घटना के समय वहां मौजूद नहीं थे। इस फैसले ने एक भार फिर झारखंड पुलिस की विशवसनीयता पर सवाल खड़े कर दिये हैं।    गिरफ्तारी से पहले जीतन गरीबों की जिंदगी पर वीडियो फिल्म बना रहा था जिसमें पुलिसिया दमन और अत्याचार का वर्णन है लेकिन जेल जाने के कारण फिल्म अधूरी रह गई। बहरहाल, लोकतांत्रिक ताकतों ने लड़ाई जारी रखते हुए भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ एकजुटता का परिचय दिया और जता दिया कि लोकतंत्र में तानाशाही की कोई जगह नहीं है। जीतन के आलावा मनोज रजवार, अनिल राम व छत्रपति मुंडा को भी पुलिस ने नरसंहार का दोषी बना दिया था पर उनकी भी बेगुनाही साबित हुई। जीतन की पत्नी अपर्णा मरांड़ी ने अपने पति की रिहाई के लिए संघर्ष जारी रखने का जो संकल्प लिया था उसमें उसे जीत मिली। लड़ाई में शुरू में अपर्णा न केवल अकेली थी बल्कि गर्भवती भी थी लेकिन धीरे-धीरे प्रगतिशील और आंदोलनकारी तबका इससे जुड़ने लगा। न केवल झारखंड बल्कि दिल्ली, आंध्रप्रदेश, पशिचम बंगाल, उतराखंड, छतीसगढ़ आदि से भी जीतन की रिहाई की आवाज बुलंद होने लगी। पिछले दिनों इसी मांग को लेकर रांची में सैकड़ों लोग जुटे जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता डा. विनायक सेन, जनकवि वरवर राव, पत्रकार प्रशांत राही सरीखी वे शख्सियतें मौजूद रहीं जो खुद इस दौर से गुजरी हैं। हाल ही में दिल्ली मे जीतन की रिहाई की मांग करत हुए विभिन्न जनसंगठनों के कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, बुद्दिजीवियों, सांस्कृतिककर्मियों का जमावड़ा हुआ था।     जीतन मरांडी के गीत यहां हर उस आदमी की जुबां पर है जिसका सरोकार आदिवासियों के हक में लड़ी जानेवाली लड़ाइयों से है। जब जीतन जेल में थे तब भी उनकी कलम गीत रच रही थी। झारखंड जैसे राज्य जहां २४ में से २१ जिले घोर नक्सल प्रभावित हैं, जहां माओवादी खोज अभियान जोरों पर है वहां किसी को भी माओवादी बता कर उसको जेल में ठूंस देना हैरानी की बात नहीं। ज्यादा दिन नहीं हुए जब नक्सल प्रभावित लातेहार मे पुलिस ने ग्रीनहंट के ऑपरेशन प्रहार के दौरान आदिम जनजाति के वफा परहीया की आंख फोड़ दी  और बिरजू के हाथों की उंगलियां काट दीं थी। अति पिछड़े छेत्र सारंडा में पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मंगल होनहांगा और सोमा गुड़िया को जान गंवानी पडी।